ख़ाक उड़ती है रात भर मुझमें,
कौन फिरता है दर-ब-दर मुझमें,
मुझ को मुझमें जगह नहीं मिलती,
कोई मौजूद है इस क़दर मुझमें।
कौन फिरता है दर-ब-दर मुझमें,
मुझ को मुझमें जगह नहीं मिलती,
कोई मौजूद है इस क़दर मुझमें।
जिनके इरादे 'मेहनत' की स्याही से लिखे होत है... उनकी 'किस्मत' के पन्ने कभी खाली नहीं होते...!!
No comments:
Post a Comment